आज का दौर पूरी तरह से डिजिटल हो चुका है। जहां पहले पढ़ाई का मतलब किताबें, नोटबुक और क्लासरूम तक सीमित था, वहीं अब स्मार्टफोन, कंप्यूटर और इंटरनेट ने सब कुछ बदल दिया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन टूल्स को इस्तेमाल करने के लिए जो कौशल चाहिए, उन्हें क्या कहते हैं? जी हां, इन्हें डिजिटल स्किल्स कहते हैं। डिजिटल स्किल्स वो क्षमताएं हैं जो हमें डिजिटल टेक्नोलॉजी को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने में मदद करती हैं। ये सिर्फ कंप्यूटर चलाना नहीं, बल्कि जानकारी ढूंढना, समस्या हल करना और क्रिएटिव तरीके से काम करना भी शामिल है।

इस आर्टिकल में हम विस्तार से जानेंगे कि डिजिटल स्किल्स क्या होती हैं, इनके कितने प्रकार हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात – पढ़ाई में ये क्यों इतनी जरूरी हैं। अगर आप एक छात्र हैं, पैरेंट्स हैं या शिक्षक, तो ये जानकारी आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। आंकड़ों के मुताबिक, आगे आने वाले वर्षों में दुनिया भर में ज़्यादातर नौकरियां ऐसी होंगी जहां डिजिटल स्किल्स की जरूरत पड़ेगी। तो आइए, इस विषय को गहराई से समझते हैं, ताकि करियर में आगे बढ़ने के लिए सही जानकारी मिल सके।
डिजिटल स्किल्स क्या होती हैं?
डिजिटल स्किल्स को समझने के लिए सबसे पहले हमें ये जान लेना चाहिए कि “डिजिटल” का मतलब क्या है। डिजिटल का अर्थ है इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी से जुड़ा हुआ, जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट और सॉफ्टवेयर। वहीं दूसरी तरफ़ स्किल्स का अर्थ है “कौशल”। तो इन दोनों को मिला कर देखे तो डिजिटल स्किल्स वो कौशल हैं जो हमें इन टूल्स को इस्तेमाल करके अपनी जिंदगी आसान बनाने और समस्या हल करने में मदद करती हैं।
ये स्किल्स दो मुख्य श्रेणियों में बांटी जा सकती हैं: बेसिक और एडवांस्ड। बेसिक डिजिटल स्किल्स वो हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी में जरूरी हैं, जैसे ईमेल भेजना, इंटरनेट पर सर्च करना या माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में डॉक्यूमेंट बनाना। वहीं एडवांस्ड स्किल्स में कोडिंग, डेटा एनालिसिस, ग्राफिक डिजाइन और साइबर सिक्योरिटी जैसी चीजें शामिल होती हैं।
उदाहरण के लिए, अगर आप एक छात्र हैं और ऑनलाइन क्लास अटेंड कर रहे हैं, तो अपने मोबाइल या कम्प्यूटर में ऐप चलाना, स्क्रीन शेयर करना या चैट में सवाल पूछना – ये सब बेसिक डिजिटल स्किल्स हैं। लेकिन अगर आप प्रोजेक्ट के लिए डेटा कलेक्ट करके एक्सेल में एनालाइज कर रहे हैं, तो ये थोड़ी एडवांस्ड स्किल है। डिजिटल स्किल्स में तीन मुख्य कंपोनेंट होते हैं: इंफॉर्मेशन लिटरेसी (जानकारी ढूंढना और वैरिफाई करना), कम्युनिकेशन स्किल्स (ऑनलाइन बातचीत) और क्रिएटिविटी (डिजिटल टूल्स से नया बनाना)।
डिजिटल स्किल्स सिर्फ टेक्निकल नहीं होतीं; ये सोशल और इथिकल पहलुओं को भी कवर करती हैं। जैसे, ऑनलाइन प्राइवेसी का ध्यान रखना, फेक न्यूज पहचानना या डिजिटल फुटप्रिंट मैनेज करना। आजकल, भारत में भी सरकार डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत इन स्किल्स को प्रमोट कर रही है, ताकि हर नागरिक डिजिटल दुनिया में पीछे न छूटे।
डिजिटल स्किल्स के विभिन्न प्रकार:
आज के समय में डिजिटल स्किल्स सिर्फ IT या टेक्नोलॉजी से जुड़े लोगों तक सीमित नहीं रह गई हैं। पढ़ाई हो, नौकरी हो या रोज़मर्रा का काम—हर जगह किसी न किसी रूप में डिजिटल स्किल्स की जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि इन्हें समझना और सीखना अब एक विकल्प नहीं बल्कि ज़रूरत बन चुका है। डिजिटल स्किल्स कई तरह की होती हैं और हर स्किल का अपना अलग महत्व है। इन्हें समझने के लिए हम इन्हें अलग-अलग कैटेगरी में देख सकते हैं।
सबसे पहले आती हैं बेसिक कंप्यूटर स्किल्स। यह डिजिटल दुनिया में कदम रखने की पहली सीढ़ी मानी जाती हैं। इसमें कंप्यूटर हार्डवेयर की सामान्य समझ शामिल होती है, जैसे कीबोर्ड, माउस, प्रिंटर या स्कैनर का सही तरीके से उपयोग करना। इसके साथ-साथ सॉफ्टवेयर स्किल्स भी जरूरी होती हैं, जैसे वर्ड प्रोसेसिंग में डॉक्यूमेंट बनाना, स्प्रेडशीट में डेटा डालना और प्रेजेंटेशन तैयार करना। उदाहरण के तौर पर पावरपॉइंट में स्लाइड्स बनाना आज लगभग हर छात्र और प्रोफेशनल के लिए जरूरी स्किल बन चुका है।
इसके बाद आती हैं इंटरनेट और वेब स्किल्स। इंटरनेट का सही इस्तेमाल करना अपने आप में एक बड़ी स्किल है। इसमें सर्च इंजन जैसे गूगल का प्रभावी ढंग से उपयोग करना, वेबसाइट्स को सही तरीके से नेविगेट करना और ऑनलाइन फॉर्म भरना शामिल है। साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम या ट्विटर पर सुरक्षित तरीके से एक्टिव रहना भी इसी कैटेगरी में आता है, ताकि प्राइवेसी और डेटा सेफ्टी बनी रहे।
तीसरी महत्वपूर्ण कैटेगरी है डिजिटल कम्युनिकेशन स्किल्स। आज ज्यादातर बातचीत डिजिटल माध्यमों से होती है। ईमेल लिखना और समझना, वीडियो कॉलिंग टूल्स जैसे जूम या गूगल मीट का इस्तेमाल करना और चैट ऐप्स जैसे व्हाट्सएप या टेलीग्राम पर सही तरीके से संवाद करना—ये सभी स्किल्स पढ़ाई और प्रोफेशनल लाइफ दोनों में बेहद काम आती हैं। खासकर ऑनलाइन क्लासेस, ग्रुप डिस्कशन और टीचर या क्लाइंट से संपर्क के लिए ये स्किल्स अनिवार्य हो चुकी हैं।
इसके बाद आती हैं डेटा मैनेजमेंट और एनालिसिस स्किल्स। इसमें एक्सेल या गूगल शीट्स में डेटा एंटर करना, उसे व्यवस्थित करना, चार्ट और ग्राफ बनाना और बेसिक स्टैटिस्टिक्स को समझना शामिल है। जो लोग थोड़ा एडवांस लेवल पर जाना चाहते हैं, वे पायथन या आर जैसे प्रोग्रामिंग टूल्स की मदद से डेटा एनालिसिस भी कर सकते हैं। आज के समय में डेटा हर फील्ड की रीढ़ बन चुका है, इसलिए यह स्किल तेजी से महत्व पा रही है।
एक और अहम हिस्सा है क्रिएटिव डिजिटल स्किल्स। इसमें फोटो एडिटिंग, वीडियो एडिटिंग और ग्राफिक डिजाइन जैसी स्किल्स शामिल होती हैं। फोटोशॉप से इमेज को बेहतर बनाना, कैपकट जैसे टूल्स से वीडियो एडिट करना या कैनवा से आकर्षक डिजाइन तैयार करना—ये स्किल्स खासतौर पर छात्रों के प्रोजेक्ट्स, प्रेजेंटेशन और सोशल मीडिया कंटेंट को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद करती हैं।
डिजिटल स्किल्स की दुनिया में कोडिंग और प्रोग्रामिंग का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। HTML, CSS, जावास्क्रिप्ट या पायथन जैसी भाषाएं सीखना आज भविष्य की नौकरियों से सीधा जुड़ा हुआ है। चाहे वेब डिजाइन हो, ऐप डेवलपमेंट हो या किसी सिस्टम को ऑटोमेट करना—कोडिंग की बुनियादी समझ हर टेक-ड्रिवन करियर में फायदेमंद साबित होती है।
इसके साथ-साथ साइबर सिक्योरिटी स्किल्स भी बेहद जरूरी हो गई हैं। इसमें मजबूत पासवर्ड बनाना और मैनेज करना, वायरस और मैलवेयर से बचाव करना और ऑनलाइन फ्रॉड या स्कैम को पहचानना शामिल है। जैसे-जैसे इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे डिजिटल सुरक्षा की समझ भी उतनी ही जरूरी होती जा रही है।
आखिर में आती है क्लाउड कंप्यूटिंग। गूगल ड्राइव, ड्रॉपबॉक्स जैसे क्लाउड टूल्स की मदद से फाइल्स को स्टोर करना, एक्सेस करना और दूसरों के साथ शेयर करना आज आम बात हो गई है। पढ़ाई में असाइनमेंट शेयर करना हो या किसी टीम के साथ डॉक्यूमेंट पर काम करना—क्लाउड स्किल्स हर जगह काम आती हैं।
इन सभी डिजिटल स्किल्स की खास बात यह है कि ये एक – दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप कोडिंग सीखते हैं तो डेटा एनालिसिस को समझना आसान हो जाता है, और अगर आपको इंटरनेट व टूल्स की समझ है तो डिजिटल कम्युनिकेशन और क्रिएटिव वर्क भी बेहतर हो जाता है। भारत में NPTEL या Coursera जैसे प्लेटफॉर्म्स पर इन स्किल्स को सीखने के लिए कई फ्री कोर्स उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से कोई भी व्यक्ति धीरे-धीरे खुद को डिजिटल रूप से मजबूत बना सकता है।
पढ़ाई में डिजिटल स्किल्स क्यों जरूरी हैं?
अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या पढ़ाई के लिए डिजिटल स्किल्स वाकई जरूरी हैं या फिर इनके बिना भी काम चल सकता है। आज की हकीकत यह है कि डिजिटल स्किल्स के बिना पढ़ाई अधूरी मानी जाती है। किताबें और क्लासरूम आज भी अहम हैं, लेकिन उनके साथ-साथ डिजिटल टूल्स और टेक्नोलॉजी ने शिक्षा का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।
सबसे पहला और सबसे बड़ा कारण है ऑनलाइन लर्निंग का बढ़ता दौर। कोविड-19 महामारी के बाद ऑनलाइन पढ़ाई सिर्फ एक विकल्प नहीं रही, बल्कि जरूरत बन गई। जूम क्लासेस, गूगल क्लासरूम और मूडल जैसे प्लेटफॉर्म्स पर क्लास अटेंड करना, लेक्चर देखना और असाइनमेंट सबमिट करना आम बात हो गई है। जिन छात्रों को डिजिटल स्किल्स की समझ नहीं होती, वे अक्सर क्लास जॉइन करने, फाइल अपलोड करने या नोट्स डाउनलोड करने में परेशानी महसूस करते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है रिसर्च और जानकारी तक आसान पहुंच। पहले किसी टॉपिक पर जानकारी जुटाने के लिए लाइब्रेरी में घंटों बिताने पड़ते थे। आज कुछ सेकंड में गूगल पर सर्च करके हजारों किताबें, रिसर्च पेपर्स और आर्टिकल्स मिल जाते हैं। लेकिन यहां चुनौती यह होती है कि सही और भरोसेमंद जानकारी कैसे चुनी जाए। फेक न्यूज से बचना, सही सोर्स पहचानना और अकादमिक प्लेटफॉर्म्स जैसे विकिपीडिया, JSTOR या गूगल स्कॉलर का सही इस्तेमाल करना – ये सब डिजिटल स्किल्स का ही हिस्सा हैं, जो छात्रों के प्रोजेक्ट और असाइनमेंट को मजबूत बनाते हैं।
पढ़ाई में कॉलेबोरेशन और ग्रुप वर्क भी एक अहम हिस्सा है। आज ग्रुप प्रोजेक्ट्स सिर्फ क्लासरूम तक सीमित नहीं रहे। गूगल डॉक्स पर एक साथ रीयल-टाइम में काम करना, स्लैक या अन्य टूल्स पर डिस्कशन करना – ये सब डिजिटल स्किल्स की मदद से ही संभव है। इससे टीमवर्क बेहतर होता है, समय की बचत होती है और सभी स्टूडेंट्स एक-दूसरे से सीख पाते हैं।
डिजिटल स्किल्स पढ़ाई को ज्यादा इफिशिएंट और प्रोडक्टिव भी बनाती हैं। अलग-अलग ऐप्स और टूल्स की मदद से छात्र अपने नोट्स व्यवस्थित कर सकते हैं, जैसे एवरनोट का इस्तेमाल करना, टाइम मैनेजमेंट के लिए टोडोइस्ट जैसे ऐप्स यूज करना या काहूट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर क्विज के जरिए खुद का टेस्ट लेना। इन टूल्स से पढ़ाई ज्यादा स्ट्रक्चर्ड हो जाती है और फोकस बढ़ता है।
एक और बड़ा कारण है फ्यूचर जॉब रेडीनेस। पढ़ाई का अंतिम उद्देश्य बेहतर करियर बनाना होता है। आज लगभग हर फील्ड – चाहे वह आईटी हो, मार्केटिंग हो या एजुकेशन – डिजिटल स्किल्स की मांग करती है। आंकड़ों के अनुसार करीब 90 प्रतिशत नौकरियों में किसी न किसी स्तर पर डिजिटल स्किल्स जरूरी हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक लगभग 1 बिलियन लोगों को डिजिटल स्किल्स की ट्रेनिंग की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में जो छात्र पढ़ाई के दौरान ही इन स्किल्स को सीख लेते हैं, वे आगे चलकर ज्यादा कॉन्फिडेंट और तैयार रहते हैं।
डिजिटल स्किल्स इनक्लूसिव एजुकेशन को भी बढ़ावा देती हैं। दिव्यांग छात्रों के लिए स्क्रीन रीडर्स, वॉयस टाइपिंग और अन्य असिस्टिव टेक्नोलॉजी पढ़ाई को आसान बनाती हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में रहने वाले छात्र भी सिर्फ एक स्मार्टफोन और इंटरनेट की मदद से ऑनलाइन क्लासेस और स्टडी मटीरियल तक पहुंच बना सकते हैं, जिससे शिक्षा का दायरा और व्यापक हो जाता है।
इसके अलावा डिजिटल टूल्स पढ़ाई में क्रिएटिविटी और इनोवेशन को भी बढ़ाते हैं। छात्र एनिमेशन बना सकते हैं, ब्लॉग लिख सकते हैं, वीडियो तैयार कर सकते हैं या यहां तक कि छोटे ऐप्स भी डेवलप कर सकते हैं। इससे पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहती और सीखने की प्रक्रिया ज्यादा रोचक और व्यावहारिक बन जाती है।
भारत में भी इस बदलाव को समझते हुए सीबीएसई और अन्य बोर्ड्स ने डिजिटल एजुकेशन को सिलेबस का हिस्सा बनाया है। हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, जैसे कई जगह इंटरनेट की कमी या छात्रों और शिक्षकों को पर्याप्त ट्रेनिंग न मिल पाना। फिर भी यह साफ है कि आने वाले समय में डिजिटल स्किल्स पढ़ाई का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं, और जो छात्र इन्हें समय रहते सीख लेते हैं, वे भविष्य की दौड़ में एक कदम आगे रहते हैं।
डिजिटल स्किल्स कैसे सीखें?
डिजिटल स्किल्स कोई ऐसी चीज़ नहीं हैं जो सिर्फ टेक्निकल बैकग्राउंड वाले ही सीख सकते हों। थोड़ी रुचि, सही दिशा और नियमित अभ्यास के साथ कोई भी व्यक्ति इन्हें आसानी से सीख सकता है। पढ़ाई में डिजिटल स्किल्स को शामिल करने के लिए सबसे जरूरी है कि सीखने की शुरुआत छोटे और आसान तरीकों से की जाए।
सबसे आसान और प्रभावी तरीका है फ्री ऑनलाइन कोर्सेस। Coursera, edX और Udemy जैसे प्लेटफॉर्म्स पर बेसिक से लेकर एडवांस लेवल तक के कई कोर्स उपलब्ध हैं। “डिजिटल लिटरेसी” जैसे शुरुआती कोर्स उन छात्रों के लिए काफी फायदेमंद होते हैं जो पहली बार डिजिटल टूल्स से जुड़ रहे हैं। इन कोर्सेस की खास बात यह है कि आप अपनी सुविधा के समय पर सीख सकते हैं।
इसके अलावा स्कूल और कॉलेज प्रोग्राम्स का भी पूरा फायदा उठाना चाहिए। कई शैक्षणिक संस्थानों में कंप्यूटर लैब्स होती हैं, जहां छात्रों को प्रैक्टिकल सीखने का मौका मिलता है। क्लास में जो सिखाया जाता है, उसे लैब में खुद करके देखने से कॉन्फिडेंस बढ़ता है और चीज़ें जल्दी समझ में आती हैं।
आज के समय में यूट्यूब भी सीखने का एक बहुत बड़ा माध्यम बन चुका है। हिंदी में हजारों क्वालिटी ट्यूटोरियल्स उपलब्ध हैं, जिनमें बेसिक कंप्यूटर से लेकर एडवांस डिजिटल स्किल्स तक सब कुछ समझाया जाता है। वीडियो देखकर सीखने का फायदा यह है कि आप किसी भी स्टेप को बार-बार देख सकते हैं और अपनी स्पीड से सीख सकते हैं।
कुछ ऐप्स और गेम्स भी डिजिटल स्किल्स सीखने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, Duolingo जैसी ऐप्स से नई स्किल्स को आसान और इंटरैक्टिव तरीके से सीखा जा सकता है। इस तरह की ऐप्स सीखने को बोझ नहीं बनने देतीं और रुचि बनाए रखती हैं।
डिजिटल स्किल्स सीखने का सबसे जरूरी हिस्सा है नियमित प्रैक्टिस। रोजाना सिर्फ 30 मिनट भी अगर आप किसी डिजिटल टूल का इस्तेमाल करते हैं, जैसे ब्लॉग लिखना, नोट्स बनाना या किसी ऐप पर काम करना, तो धीरे-धीरे आपकी समझ और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं। सीखने का असली फायदा तभी मिलता है जब उसे रोजमर्रा की ज़िंदगी में अपनाया जाए।
इस प्रक्रिया में पैरेंट्स की भूमिका भी अहम होती है। बच्चों को डिजिटल टूल्स सीखने के लिए गाइड करना जरूरी है, लेकिन साथ ही यह ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है कि उनका स्क्रीन टाइम सीमित रहे और सही चीज़ों पर फोकस बना रहे।
चुनौतियां और समाधान
डिजिटल स्किल्स सीखने के रास्ते में कुछ चुनौतियां भी सामने आती हैं। सबसे आम समस्या है एक्सेस की कमी, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट की सुविधा सीमित होती है। ऐसे में सरकार की डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं का लाभ लेकर पब्लिक इंटरनेट सेंटर या स्कूल सुविधाओं का उपयोग किया जा सकता है।
दूसरी चुनौती है उम्र का फैक्टर। कई बड़े लोग यह सोचकर सीखने से हिचकिचाते हैं कि डिजिटल चीज़ें उनके लिए मुश्किल हैं। इसका समाधान यही है कि बहुत बेसिक और आसान कोर्सेस से शुरुआत की जाए, ताकि डर धीरे-धीरे खत्म हो सके।
एक और अहम चिंता है सिक्योरिटी रिस्क। ऑनलाइन फ्रॉड या हैकिंग का डर कई लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से दूर रखता है। इसका समाधान है बेसिक साइबर सिक्योरिटी ट्रेनिंग, जिसमें मजबूत पासवर्ड, सुरक्षित वेबसाइट्स और फेक लिंक से बचने की जानकारी दी जाती है।
अंत में आती है ओवरलोड और ज्यादा स्क्रीन टाइम की समस्या। लगातार स्क्रीन देखने से थकान और ध्यान भटकने लगता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है बैलेंस बनाना – पढ़ाई, डिजिटल लर्निंग और आराम के बीच सही संतुलन रखना।
FAQs
डिजिटल स्किल्स सीखने की शुरुआत कहां से करें?
शुरुआत बेसिक से करें, जैसे कंप्यूटर ऑन-ऑफ करना और इंटरनेट सर्फिंग। फिर फ्री कोर्सेस जॉइन करें।
क्या डिजिटल स्किल्स सिर्फ आईटी छात्रों के लिए हैं?
नहीं, हर फील्ड में जरूरी हैं, जैसे मेडिसिन में ई-हेल्थ रिकॉर्ड्स या आर्ट्स में डिजिटल डिजाइन।
पढ़ाई में डिजिटल स्किल्स से क्या नुकसान हैं?
ज्यादा स्क्रीन टाइम से आंखों की समस्या या डिस्ट्रैक्शन, लेकिन बैलेंस से फायदे ज्यादा।
भारत में डिजिटल स्किल्स के लिए सरकारी प्रोग्राम क्या हैं?
डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और पीएमजीडीआईएसए जैसे प्रोग्राम्स फ्री ट्रेनिंग देते हैं।
क्या बच्चे डिजिटल स्किल्स खुद सीख सकते हैं?
हां, लेकिन पैरेंट्स की निगरानी में, ताकि सुरक्षित रहें।
निष्कर्ष:
अंत में इतना ही कहूँगा कि डिजिटल स्किल्स वो आधार हैं जो पढ़ाई को आधुनिक और प्रभावी बनाती हैं। ये न सिर्फ जानकारी देते हैं बल्कि छात्रों को आत्मनिर्भर बनाते हैं। अगर आप अभी से इन्हें सीखना शुरू करेंगे, तो फ्यूचर में आगे रहेंगे। याद रखें, टेक्नोलॉजी बदलती रहती है, तो लर्निंग कभी बंद न करें। अगर सही तरीके और सोच के साथ डिजिटल स्किल्स सीखी जाएं, तो ये न सिर्फ पढ़ाई को आसान बनाती हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करती हैं।

Leave a Reply